“ निमाड़ी मनुस” का अर्थ निमाड़ क्षेत्र का मनुष्य या निमाड़ी भाषा बोलने वाला व्यक्ति। “निमाड़ी” शब्द निमाड़ अंचल को संदर्भित करता है, और ” मनुस ” या “मनुष्य” का अर्थ आदमी या इंसान होता है। इसलिए, “निमाड़ी मनुस ” एक ऐसे व्यक्ति को इंगित करता है, जो निमाड़ क्षेत्र से संबंधित है और वहां की संस्कृति, खान- पान, आचार -विचार व बोली से जुड़ा हुआ है।

निमाड़ का इतिहास
निमाड़ मध्य प्रदेश के पश्चिमी ओर स्थित है। इसकी भौगोलिक सीमाओं में एक तरफ़ विंध्याचल पर्वत और दूसरी तरफ़ सतपुड़ा पर्वत हैं, जबकि मध्य में नर्मदा नदी और ताप्ती नदी का अविरल प्रवाह है। पौराणिक काल में निमाड़ अनूप जनपद कहलाता था। विश्व की प्राचीनतम नदियों में एक नदी नर्मदा का विकास निमाड़ में ही हुआ है। नर्मदा-घाटी-सभ्यता का समय महेश्वर नावड़ाटौली में मिले पुरा साक्ष्यों के आधार पर लगभग ढाई लाख वर्ष माना गया है। प्रागैतिहासिक काल के आदिमानव की शरणस्थली सतपुड़ा और विंध्याचल रही हैं। आज भी यहां के वन-प्रान्तों में आदिवासी समूह निवास करते हैं। नर्मदा तट पर आदि अरण्य वासियों का निमाड़ पुराणों में वर्णित है। उनमें गौण्ड, बैगा, कोरकू, भिलाला, भील, शबर आदि प्रमुख हैं।
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इतिहासकारों के मतानुसार रामायण काल, महाभारत काल, सातवाहन, कनिष्क, अभिरोहर्ष, चालुक्य, भोज, होलकर, सिंधिया, मुगल तथा ब्रिटिश आदि से यह क्षेत्र जुड़ा हुआ है। विभिन्न कालों में यहां जैन, यदुवंशी, सिद्ध पंथी, नागपंथी आदि का प्रभाव रहा है। प्राचीन स्थापत्य कला के अवशेष इस क्षेत्र की ऐतिहासिक गाथाओं को व्यक्त करने में आज भी सक्षम हैं। इस क्षेत्र में प्राप्त पाषाण कालीन शस्त्रों से भी यह सिद्ध होता है। ऐसा अनुमान है कि आर्य एवं अनार्य सभ्यताओं की मिश्रित भूमि होने के कारण यह क्षेत्र “निमार्य” नाम से जाना जाने लगा जो कि कालांतर में अपभ्रंश हो कर “निमार” एवं फिर “निमाड़” में परिवर्तित हो गया। (निमा = आधा) । एक अन्य मतानुसार यह नाम नीम के वृक्षों के कारण पड़ा। बाद में इसे निमाड़ की संज्ञा दी गयी। फिर इसे पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ के रूप में जाना जाने लगा।
प्राकृतिक मार्ग पर बसा यह क्षेत्र सदैव ही महत्वपूर्ण रहा है। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में यह क्षेत्र – महेश्वर के होलकर, मालवा के परमार असीरगढ़ के अहीर, माण्डू के मुस्लिम शासक, मुगल तथा पेशवा व अन्य मराठा सरदारों शिंदे, पवार के साम्राज्य का हिस्सा रहा है। निमाड़ का जिले के रूप में गठन ब्रिटिश राज में हुआ, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय खंडवा में था। मुस्लिम शासकों के दिनों में बुरहानपुर प्रशासनिक मुख्यालय हुआ करता था।
1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य के गठन के साथ ही निमाड़ दो जिलों पूर्व निमाड़ और पश्चिम निमाड़ के रूप में अस्तित्व में आ गया। पूर्व निमाड़ का मुख्यालय खंडवा तो पश्चिम निमाड़ का मुख्यालय खरगौन को बनाया गया था। कालांतर में प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण दिनांक 25 मई 1998 को “पश्चिम निमाड़” को दो जिलों – खरगौन एवं बड़वानी में एवं 15 अगस्त 2003 को पूर्व निमाड़ खंडवा को बुरहानपुर जिले में विभाजित किया गया
कला और संस्कृति से संपन्न है निमाड़ का जनजीवन
निमाड़ का जनजीवन कला और संस्कृति से संपन्न है। यहां जीवन का एक दिन भी ऐसा नहीं जाता, जब गीत न गाए जाते हो , या व्रत-उपवास कथा वार्ता न कही-सुनी जाती हो। निमाड़ की पौराणिक संस्कृति के केंद्र में बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग एवं मां नर्मदा एवं मां ताप्ती इसकी आत्मा है। नर्मदा तट पर मांधाता और महिष्मती प्राचीन तपोभूमि है। वर्तमान महेश्वर प्राचीन महिष्मती ही है। कालीदास ने स्वयं नर्मदा और महेश्वर का वर्णन किया है। निमाड़ में सूर्यपुत्री और शनिदेव की बहन मां ताप्ती का प्रवाह है ,जिसकी धार्मिक मान्यता है कि यह एकमात्र ऐसी नदी है, जो हड्डियों को गला देती है। इस नदी की धारा में लोग पिंडदान, तर्पण और दीपदान भी करते हैं। शनि के प्रभाव को कम करने के लिए ताप्ती में स्नान का महत्त्व बताया गया। इसके साथ ही निमाड़ आदि शंकराचार्य जी की तपोस्थली, दादाजी धुनी वाले, संत सिंगाजी और संत सियाराम बाबा की धरती के साथ ही निमाड़ नर्मदा नदी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तटों के रूप में प्रसिद्ध है।
निमाड़ की अस्मिता के बारे में निमाड़ से आने वाले लोकप्रिय कवि पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय लिखते है- “जब मैं निमाड़ की बात सोचता हूँ तो मेरी आँखों में ऊँची-नीची घाटियों के बीच बसे छोटे-छोटे गांव से लगा ज्वार और तुअर के खेतों की मस्तानी खुशबू और उन सबके बीच घुटने तक धोती पर महज कुर्ता और अंगरखा लटकाकर भोले-भाले किसान का चेहरा तैरने लगता है। कठोर दिखने वाले ये जनपद जन अपने हृदय में लोक साहित्य की अक्षय परम्परा को जीवित रखे हुए हैं।
निमाड़ की विभूतियों ने बढ़ाया मान
निमाड़ की धरती कई ऐसी विभूतियों की जन्मभूमि के साथ कर्मभूमि रही है ,जिन्होंने इस मिटटी में जन्म लेकर न केवल इसका मान विश्व में बढ़ाया है, बल्कि इसे कर्मभूमि मानकर निमाड़ की मिट्टी मे ही ओतप्रोत हुए है। निमाड़ हिंदी साहित्य के महान कालजयी कवि माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मभूमि रही है तो सुप्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार , महान गायक किशोर कुमार के जन्मस्थान के रूप में निमाड़ की मिटटी की सुगंध विश्व भर में फैली हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन के नायक टंटया मामा के बलिदान की ऋणी निमाड़ भूमि , पद्मश्री, पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण से सम्मानित महान वैज्ञानिक अनिल काकोदकर की जन्म भूमि , पद्मश्री कांता बहन त्यागी, जिनके त्याग और बलिदान की ऋणी है निमाड़ की आदिवासी महिलाएं। पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय एवं पद्मश्री जगदीश जोशीला की कलम के बिना निमाड़ की कल्पना अधूरी है। मध्यप्रदेश की राजनीति में सत्ता के शीर्ष पद मुख्यमंत्री तक पहुंचे महान स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी नेता भगवंत राव मंडलोई, विधानसभा अध्यक्ष के पद को शुशोभित करने वाले बुरहानपुर के पंडित बृजमोहन मिश्रा, निमाड़ के नेता सहकारिता के स्तंभ के रूप में समूचे प्रदेश में पहचाने जाने वाले खरगौन जिले के कसरावद के सुभाष यादव ने प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर तो निमाड़ के गांधी के रूप में प्रसिद्ध खंडवा लोक सभा के सांसद रहे नंद कुमार सिंह चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर सुशोभित होकर निमाड़ का मान बढ़ाया है।
साधारण से असाधारण तक निमाड़ी मनुस
एक साधारण सा सफ़ेद कुर्ता पैजामा या धोती पहने हुए और उसपर सफ़ेद गमछा ओढे हुए निमाड़ी मनुस की यात्रा आज असाधारण मनुस ( आदमी ) तक पहुंच गई है। न केवल निमाड़ में रहकर ,बल्कि निमाड़ से निकले आज अनेको निमाड़ी मनुस कला, संस्कृति, राजनीति, शिक्षा ,चिकित्सा, शासन ,प्रशासन, व्यापार, खेल आदि क्षेत्रों में प्रदेश ही नहीं देश और विदेश तक में अपना परचम लहरा रहे है। ऐसे निमाड़ी मनुस की उपलब्धियों को हम लगातार आपके सामने लाते रहेंगे।
‘निमाड़ी दिवस’
19 सितंबर को पूरे निमाड़ अंचल में ‘निमाड़ी दिवस’ मनाया जाता है। इस दिन निमाड़ी बोली से जुड़े रचनाकार, साहित्यकार, कलाकार एक मंच पर एकत्रित होते हैं और निमाड़ी में चर्चा करते हैं। इस दिन निमाड़ी से जुड़े कलाकारों का सम्मान भी किया जाता है.
निमाड़ के वरिष्ठ रचनाकारों एवं साहित्यकारों ने 19 सितंबर, 1953 निमाड़ी को लेकर एक संस्था अखिल निमाड़ी लोक परिषद का गठन किया और निमाड़ी का उत्थान, इसका उन्नयन कैसे हो, इसकी चिंता प्रकट की। यही से निमाड़ी दिवस की शुरुआत भी हुई। तब से हर साल 19 सितंबर को अखिल निमाड़ लोक परिषद द्वारा पूरे निमाड़ अंचल में निमाड़ी दिवस मनाया जाने लगा।
